Thursday, June 23, 2011

"वो" और "मैं"...!!

((जब-जब 'खुद' को देखना चाहा... खुद को दो हिस्सों में बंटा पाया... कभी "वो" जो जीती ज़िन्दगी... तो कभी "मैं" जिसे जीती ज़िन्दगी... कुछ शब्द सिर्फ 'मेरे' बारे में... मेरी 'नज़र' में... मुझे जानने के लिये... मुझे समझने के लिये...))
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वो सोचती बहुत...
मैं उसे रोक नहीं पाती...
वो नादाँ बहुत...
मैं उसे समझा नहीं पाती...
वो हंसती बहुत...
मैं मुस्कुरा भी नहीं पाती...

वो अनजान सबकी निगाहों से...
मैं जानती वो ये परख नहीं पाती...
वो समझती कि वो समझती है सबको...
मैं नासमझ कि मैं खुद को नासमझ हूँ पाती...
वो खुश कि वो नहीं जानती छल-कपट...
मैं नाखुश कि मैं ये छल से उसे वाकिफ करा नहीं पाती...
वो रखती बड़ा दिल हर किसी के लिये...
मैं बड़े दिल में भी खुद को समां नहीं पाती...

वो उभरती हर नए दिन के साथ...
मैं हर शाम के साथ गहरा नहीं पाती...
वो करती कोशिशें दिल ना तोड़ने की...
मैं टूटे दिलों को नज़रें उठा देख भी ना पाती...
वो मदमस्त अल्हड़ पवन की तरह...
मैं गंभीर, खुद को वक़्त-सा चलता पाती...
वो सजाती इन्द्रधनुष सपनों के आसमान में...
मैं बादलों से इन्द्रधनुष को छुपता पाती...

वो पसंद ना करती मुझे...
मैं उसे अपनी पसंदगी में ना पाती...
वो करती तकरार, रखती तर्क अपनें...
मैं चुप रहती, उसे नकार ना पाती...
वो तंग आ चुकी मुझसे पर साथ ना छोड़ती...
मैं भी मजबूर उस से जुदा हो ना पाती...
वो करती जब ढोंग मुझसे अनजान रहने का...
मैं भी तब उसकी नाराज़गी नज़रंदाज़ कर पाती...

वो बढ़ती रहती अपनें रास्ते...
मैं अपनें क़दम मंजिल को बढ़ता पाती...
वो चाहतें रखती बेशुमार...
मैं झूठी चाहतों को पनाह दे ना पाती...
वो अपनें अन्दर की "मैं" बन ना पाती...
मैं अपनें अन्दर की "वो" से खुद को दूर होता पाती...!!

:::::::: जुली मुलानी ::::::::
:::::::: Julie Mulani ::::::::



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